झूठ को सच जैसा सजाता है विज्ञापन

गुलाब का फूल कभी नहीं करता
अपनी  सुगंध का  विज्ञापन
उसकी सुगंध से महकता है
अपने आप ही घर का आंगन
कमल का फूल कभी अपने गुणों का
बखान नहीं करता
आदमी की आँखों को
वैसे ही लगता है मनभावन
जिनमें भाव की गहराई  नहीं
ऐसी तुकबंदी को कितना भी सुनाओ
नहीं पहुंच पाती कानों से आगे
दिल को छू लें ऐसे शब्दों से सजे
गीत जब भी कानों में गूंजें
अच्छे लगे
बसंत हो या सावन
शायद इसलिए अब जज्बात
कहीं अँधेरे में खोये लगते हैं
जो सच में खूबसूरत है चेहरे
कहीं सोये लगते हैं
लोग ज्ञान और श्रद्धा में
रमने की बजाय
आत्मविज्ञापन में भटकते हैं
सच कितना भी खूबसूरत हो
लोगों के सामने नहीं आता
झूठ को ही सजा लेता है
एकदम सच जैसा विज्ञापन

2 Responses to “झूठ को सच जैसा सजाता है विज्ञापन”

  1. बिल्कुल सही…सत्य कहा है-

    शायद इसलिए अब जज्बात
    कहीं अँधेरे में खोये लगते हैं
    जो सच में खूबसूरत है चेहरे
    कहीं सोये लगते हैं
    लोग ज्ञान और श्रद्धा में
    रमने की बजाय
    आत्मविज्ञापन में भटकते हैं

  2. “झूठ को ही सजा लेता है
    एकदम सच जैसा विज्ञापन”
    बिल्कुल सटीक रचना लिखीं है।”आत्मविज्ञापन” वाकई अच्छा है।

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