यह पब्लिक है, सब जानती है

हीरो को जन्म दिन हो तो
सारे चैनल भौंपू हो जाते
बस उसकी आरती सुनाये जाते
चालीस पार हो चुके हों
और बिकती हो खबर बाजार में
तो उसे जवान बताते
और चालीस पार आम आदमी को
स्वस्थ रहने के लिए
गोलियों के ब्रांड
बाल काले रखने के लिए
अनेक तेलों के नाम सुझाते

कहैं दीपक बापू कब तक
जनता को चलाओगे
अधेडावस्था के लोगों को कब तक
नवयोवनाओं की आँखों में बसाओगे
दावा करते हो देश में जागरूकता लाने का
फैलाते हो भ्रम
सच बोलने में आती है शर्म
खुलने लगे हैं कर्म
यह जनता सब जानती है
तुम्हारे सच के पीछे झूठ को जानती है
इसलिए तुम नाम बदलते हो
चेहरे वही पुराने सामने लाते
खबर के नाम पर गाने परोसते
जज्बात के नाम पर हीरो के अलावा
और लोग तुम्हें नहीं सुहाते
पर याद रखना यह पब्लिक है
लोग तुमसे नहीं चलते
वही तुम्हें चलाते
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3 Responses to “यह पब्लिक है, सब जानती है”

  1. बहुत बढिया लिखा है…

    कहैं दीपक बापू कब तक
    जनता को चलाओगे
    अधेडावस्था के लोगों को कब तक
    नवयोवनाओं की आँखों में बसाओगे

  2. अरे भाई जी, हम तो ५० तक युवा ही मानते हैं. ६ पैक एब….बनाने के चक्कर में हैं और आप हतोत्साहित कर रहे हैं. :(

  3. काश की आपकी यह कविता उस चैनल तक पहुंच जाए
    हम लोग
    बच जाएं इस भ्रम को बारबार सुनने और देखने से

    बहुत ही अच्‍छी कविता

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