चाणक्य नीति:निर्धन के लिए सभाएँ विष समान

१.प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि अलग-अलग होती है, एक ही शरीर जी तीन ढंग से देखते हैं. योगी इसे नश्वर रूप में, भोगी इसे काम वासना के रूप में और सुनार मोम के घडे के रूप रूप में देखता है.

२.दुष्ट और काँटों को दबाने के दो ही उपाय है. पहला उपाय है जूता और दूसरा उपेक्षा अर्थात बगल से बिना देखे निकला जाये.

३.अच्छी और बुरी वस्तु दोनों की अति बुरी होती है. अच्छी बाते और गुण भी कभी विपत्ति का कारण बन जाते हैं. रजा बलि को अत्यादिक दानशीलता के कारण बन्धन में बंधना पडा और अत्यधिक अंहकार के कारण रावण का वध हुआ.

४.निर्धन व्यक्ति के लिए किसी प्रकार की सभाएं विष समान होती हैं. गोष्ठियों में तो धनवान व्यक्ति ही जा सकते हैं. यदि भूल से कोई निर्धन व्यक्ति ऐसे सभा स्थलों में चला भी जाये तो उसकी मूर्खता होगी क्योंकि वहाँ उसे अपमानित होकर ही निकलना पड़ता है.

2 Responses to “चाणक्य नीति:निर्धन के लिए सभाएँ विष समान”

  1. सही बात!

  2. दुष्ट और काँटों को दबाने के दो ही उपाय है. पहला उपाय है जूता और दूसरा उपेक्षा अर्थात बगल से बिना देखे निकला जाये.

    –यह नीति तो तुरंत अमल में लाना चाहिये. :)

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