रहीम के दोहे:मछली का जल प्रेम प्रशंसनीय

मीन कटि जल धोइये, खाए अधिक पियास
रहिमन प्रीति सराहिये , मुयेउ मीत कई आस

कविवर रहीम कहते हैं के को मछली को काटकर पकाने से पहले उसे पानी में धोना पड़ता है और उसे खाते हैं टू और अधिक प्यास लगती है। ऐसे मछली के प्रेम की प्रशंसा के जानी चाहिए जो अपने प्रिय (जल) से बिछड़ते ही उससे मिलने के लिए प्राण त्याग देती है।

भावार्थ- आशय यह है की आत्मा तो परमात्मा से बिछड़ का आयी है और जो भक्त इसे जानते हैं और उसे पुन: मिलने के लिए अपना पूरा जीवन उसकी भक्ति में लगा देते हैं वह धन्य हैं।

मुकता कर करपूर कर, चातक जीवन जोय
एतो बडों रहीम जल, ब्याल बदन विष होय

कविवर रहीम कहते हैं की चातक पक्षी द्वारा स्वाति नक्षत्र के जल की एक बूँद से मुक्ता कपूर हो जाता है और सर्प के मुख में गिरने से वह विष होता है।

भावार्थ-यहाँ उन्होने संगति के प्रभाव का वर्णन किया है और यह स्पष्ट कर दीया है की जिअसी संगती मिलती है वैसा ही आदमी हो जाता है।

One Comment

  1. Posted 21/10/2007 at 14:15 | Permalink

    भावार्थ प्रेरणास्प्रद है.


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