आज पूरे देश में दुर्गा नवमी मनाई जा रही है और कल दशहरा है.. राम केवल भारत के ही नही वरन विश्व के हृदय नायक हैं. भगवान् श्रीराम के चरित्र पर अनेक संतो और विद्वानों ने अपने ढंग से विचार प्रस्तुत किये हैं और उनका अध्ययन, श्रवन और मनन हृदय को सुख प्रदान करता है.
भगवान् श्री राम के चरित्र का जो मुख्य तत्व वाल्मीकि कृत रामायण के अध्ययन से मेरे समक्ष उभरता है वह यह कि उन्होने किसी विशेष प्रकार की पूजा पद्धति की स्थापना का प्रयास न कर केवल यही सन्देश दिया है कि किसी को भी दूसरे के कार्य में दखल नहीं देना चाहिए. उनका धर्म स्थापना का उद्देश्य किसी प्रकार की पूजा पद्धति की स्थापना तक सीमित नहीं बल्कि इस पूरे विश्व में शांति और जन कल्याण का था. यह सही है कि उनका पूरा जीवन उन्हीं राक्षसों से संघर्ष करते हुए बीता जो यज्ञ-हवन और तपस्या में विघ्न डालने और ऋषि-मुनियों और तपस्वियों को मार डालने का अभियान चलाये हुए थे. भगवान् श्री राम जी का संघर्ष तो उनसे सीता के विवाह से पूर्व ही शुरू हो गया था जब विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा करने पहुंचे थे. अगर सीता का हरण नहीं भी हुआ होता तो रावण के साथ श्रीराम जी का कभी न कभी युद्ध होता- यह अलग बात है कि ऐसा दुष्कृत्य कर रावण ने अपने पूरे कुनबे को नष्ट करवा डाला.
जैसे जैसे श्रीरामजी अपनी शक्ति संचय करते जा रहे थे वैसे ही उनका संघर्ष राक्षसों के राजा रावण से तय होता जा रहा था. रावण स्वयं भी नास्तिक नहीं था बल्कि शिव उसके आराध्य देव थे. उसने खुद भी बड़ी भारी तपस्या की और वरदान पाया. इसी वरदान से उसे अहंकार हो गया और यज्ञ-हवन और तपस्या जैसे कार्य उसे असहनीय हो गए और उसने अपने अधीनस्थों को ऐसे स्थानों पर व्यवधान डालने के आदेश दिए जहाँ यह सब होते थे. इस कारण जहाँ भी यज्ञ-हवन की अग्नि का धुआं उठता या कहीं भगवत नाम का उच्चारण होता राक्षस उसमें विघ्न डालने पहुंच जाते और उसे बंद करवा देते और न करने पर हत्याएं तक कर देते थे. इसके बावजूद कुछ ऐसे ऋषियों- और मुनियों के आश्रमों से वह लोग दूर ही रहते थे जो न केवल अपनी तपस्या से अलौकिक शक्तियाँ अर्जित कर चुके थे बल्कि अपने आश्रमों में( जिन्हें आज के समय में हम उनकी प्रयोगशालाएं भी कह सकते हैं) दिव्यास्त्रों का निर्माण भी कर चुके थे. रावण उन पर आक्रमण नहीं कर सकता था और अपनी मर्यादाओं से बंधे ऋषि-मुनि उसे घर जाकर न तो शाप दे सकते थे और न दिव्यास्त्रों के साथ हमला कर सकते थे. उन्हें प्रतीक्षा थी किसी धनुर्धर की और श्री राम जी उस समय अपनी कीर्ति एक धनुर्धर के साथ धर्म रक्षक के रूप में अर्जित कर चुके थे. वह इन दिव्य आश्रमों पर गए और ऋषियों और मुनियों ने उन्हें अपने यह दिव्यास्त्र प्रदान किये. इस तरह इस लोक में ही एक मनुष्य की तरह शक्ति संचय कर यह सन्देश भी दिया कि एक सामान्य मनुष्य धर्म के रास्ते पर चले तो उसे भी ऐसी शक्ति इसी लोक में मिल सकती है.
रावण उनकी बढ़ती शक्ति से भयाक्रांत था और वह उन पर हमला कर अपने इलाके में आमंत्रित कर उनसे युद्ध चाहता था और सीता हरण के पीछे यही उसका उद्देश्य था. उसको यह अनुमान नहीं था कि राम अपने साथ चतुरंगिणी सेना और वह भी सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जाम्बवान और नल-नील जैसे योद्धाओं से भरी उसके यहाँ ले आयेंगे. रावण ने सीता को अशोक वाटिका में रखने के उनकी निगरानी और देखभाल के लिए महिलाओं को लगाया यह इस बात का प्रमाण था कि राजा के रूप में भी वह अपने कर्तव्य जानता था. उसने कभी उनको हाथ लगाने का प्रयास नहीं किया-इसके पीछे कारण उसे मिला वह शाप भी था जिसमे किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध हाथ लगाने पर उसके सिर के टुकड़े होने की बात कही गयी थी और उसने यह बात स्वयं ही लोगों को बताई थी ताकि उसे कोई उकसाये नहीं. उसका एकमात्र उद्देश्य श्री राम और श्री लक्ष्मण को युद्ध में मार डालना था जो स्वयं भी उसे मारने के लिए तैयार हो रहे थे.
श्री राम जी ने स्वयं भी यज्ञ-हवन किये पर इसके लिए किसी को प्रेरित नहीं कर रहे थे. राक्षसों को परास्त किया तो केवल इसलिए कि वह दूसरों की भक्ति में बाधा डाल रहे थे न कि इसलिए कि वह स्वयं यज्ञ-हवन नहीं करते. कोई किसी की भक्ति में खलल न डाले यही उनका उद्देश्य था. हमारे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी न जो सर्व धर्म समभाव का जो सन्देश दिया है वह अपने हृदय नायक भगवान श्री राम के इसी चरित्र से प्रभावित होकर दिया है. वैसे यज्ञ-हवन कोई मूर्ति पूजा का प्रतीक नहीं है और कई वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह सिद्ध हो चुका है कि आदमी के मस्तिष्क पर इनका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इनमें उच्चारित मंत्रों से मानसिक शुद्धि होती है. श्री राम जी ने अगर ऐसे सत्कार्यों की रक्षा का अभियान चलाया तो केवल इसीलिए कि इस विश्व में शांति और कल्याण के भाव की धारा सतत बहती रहे. भगवान् श्री राम के चरित्र की महिमा अनंत है और मैं आगे भी इसी तरह की चर्चा में करता रहूँगा-क्योंकि मुझे इसमें बहुत आनंद आता है.
4 Comments
are you sure today is ram navmi?????
रामनवमी की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनायें. आलेख बहुत पसंद आया.
मुझे खेद हैं की त्रुटिवश दुर्गानवमी को रामनवमी लिख गया था.
दीपक भारतदीप
I am very much pleased to see, this :-1/ a hindi word search on google 2/ your article in Hindi. I do love to type,in hindi,but not so conversant..Your finding “वह यह कि उन्होने किसी विशेष प्रकार की पूजा पद्धति की स्थापना का प्रयास न कर केवल यही सन्देश दिया है कि किसी को भी दूसरे के कार्य में दखल नहीं देना चाहिए.” is appriciable.