समाज के ठेकेदारों की
पड़ती जा रही थी छबि फीकी
उन्होने तय किया
फैसला नये ज़माने के साथ चलने का
अपने तौर तरीकों को बदलने का
पहले लोग घर के झगडों की
पंचायत कराने आते थे
अब अदालतों में जाने लगे थे
उन्होने तरीका यह सोचकर बदला कि अब
लोग लोगों के आने का इन्तजार नहीं करेंगे
ऐसे मुद्दे उछालेंगे कि लोग
आपस में पहले से ज्यादा लड़ेंगे
फिर प्रस्ताब रखेंगे उनके सामने
आपस में समझौते करने का
उनकी योजना काम आयी
उनके पास अब रोज आते हैं
अवसर शांति के प्रवर्तक बनने का
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One Comment
संदर्भ नहीं समझ पाया. शायद कोई बड़ा समाचार नजर से चुक गया लगता है.