1.सुकर्म करने वाले कभी भी लोग,भोग, योग और पत्र(रुपया-पैसा) का संचय नहीं करते। इसी कारण उनका सुयश सर्वत्र फैलता है और विक्रमादित्य हौं या भगवान श्री कृष्ण सब अपने अपने सकर्मों के लिए प्रसिद्ध हैं पर इनमें से किसी ने भी भोग, योग और धन को केवल अपने पास ही तक सीमित नहीं रखा। अपने सत्कर्मों से अर्जित फल को पूरे समाज में बाँटा। मधु मक्खियों को देखो कितने परिश्रम से वह मधु को एकत्रित करती हैं यह जानते हुए भी कि इसे कोई तोड़ कर ले जायेगा। इस प्रकार से परोपकार के कारण ही लोगों का सुयश बना रहता है।
2.सुयश के लिए सुकर्म आवश्यक है। बिना सुकर्म के सुयश नहीं मिलता। सुकर्म रूपी दुग्ध से ही सुयश रूपी नवनीत निकलती है। सुकर्म ही सुकर्म का जन्मदाता है।
3.जो पाखंडी होता है वह दूसरों के काम बिगाड़ता है, धनी द्वेष करने वाला ऊपर से मणि पर भीतर से क्रूर होती है वह मार्जर कहलाता है। बिल्ली में भी लगभग इसी प्रकार के स्वभाव होते हैं।
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सत्य वचन.
bahut accha laga aapke vichar sarahaniya hai . aasha hai aage bhi hame accha padne ko milega . shubhkamnaye.
HINDI FONT- Kurti Dev011