स्वार्थी की नम्रता दिखावे की

नमन नवां तो क्या हुआ, सुधा चित्त न ताहिं

पारधिया दूना नवेँ, चीता चोर समान

जिसके हृदय में सरलता और सहजता का भाव उसकी नम्रता और झुकना भी किस काम का? यूँ तो शिकारी भी शिकार करते समय झुक जाता है परन्तु अपने बाणों से मृग को मार देता है। उसी प्रकार स्वार्थ सिद्धि के स्वार्थी व्यक्ति झुक-झुक कर अपना काम निकलता है।

लेखकीय अभिमत-हमने जीवन में कई बार देखा होगा कि कुछ लोग व्यवहार में सीमा से अधिक नम्रता दिखाते हैं और वह अपना काम जब निकाल जाते हैं और फ़िर पलट कर भी नहीं देखते तब हमें उनकी वास्तविकता का पत लगता है पर  हम कर कुछ नही सकते। इसलिये जो सीमा से अधिक विनम्रता दिखाते हैं, उनसे सतर्क रहना चाहिये।

2 Responses to “स्वार्थी की नम्रता दिखावे की”

  1. बंधू -अर्थ में सरलता सहजता का भाव के पश्चात शायद “”नहीं “” शब्द टाईप होने से रह गया है -अर्थ और व्याख्या अच्छी लगी “नमन नीच की अति दुखदायी

  2. punashch=आजके लेख में आपका नाम आगया है अगर आप अनुचित समझते हो तो हटा देंगे
    आपके पसंदीदा ब्लॉग में मेरा नाम देख कर बहुत खुशी हुई
    मेरे पास आपका ई मेल नहीं है
    मुझे ब्लॉग वाणी या चिट्ठाजगत पर अपने को ले जाना नहीं आता है
    आप अपना समझ कर जितनी कृपा कर सकते हो करदें पोस्ट डाल दें समीक्षा के रूप में या मित्रों को ई मेल करदें मुझे आप अपना आश्रित समझ लीजिये -आपके लेखों से आपकी भावना जान कर लिख रहा हूँ

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