आओ सुनो एक फालतू दिखने वाला गम्भीर चिन्तन

                  जीवन में सुख सभी पाना चाहते हैं पर कोइ दुसरे को सुख देना नहीं चाहता । अब बताईये कि सुख जब कोइ किसी को देना ही नहीं चाहता तो सुख की फसल यहां उगे कैसे । इश्वर ने इस धरती को बनाया है। उसने समस्त जीवों को यहां हर सामान मुहैया कराया है। सभी को एस दुसरे से जोडा है। सबसे पहले वह हर जीव को उसके मातापिता से जोड़ता है। फिर उसे दुसरे जीओं से सम्पर्क करने की बुध्दी दीं है। मनुष्य को उसने ज्यादा बुध्दिमान बनाया है कि वह समस्त जीवों की रक्षा करेगा। हुआ इसका उल्टा । मनुष्य ने इस अपनी बुध्दी का दुरूपयोग किया और समस्त उस जीव का दुश्मन बन गया जो उसके मित्र थे। उसने अपने तुच्छ हितों की खातिर उन शेरों को मार डाला जो वनराज बनाकर वनों की रक्षा करते थे । उन साँपों को मार डाला जो उसके लिया खाद्यान्न की रक्षा करने के लिया कीरों को खा जाते थे। उसने उन पेड़ों और पोधों को अपने फर्नीचर के लिए काटा जो उसके लिए ओक्सीजों यानी प्रान्वायू बनाते थे । कुल मिलाकर उसने वह हर काम किया जो कालांतर में उसे हानि पहुंचाने वाले सिध्द हुए। अब क्या है।

                   डाक्टरों के अस्पताल पंच सितारा होटलों के मानिंद चमक रहे हैं। जिसे जीते स्वर्ग भोगना हो उसे बीमार पड़ना जरूरी है और उससे भी ज्यादा जरूरी है कागजों के वह टुकड़े जो वहन एंट्री दिलवाते हैं। अब हालत बहुत खराब है , कोशिश सभी कर रहे हैं हैं कि मैं दुसरे को खुश दिखूं पर एक तो कोइ किसी की तरफ देख नही रहा है दुसरे आदमी नकली ख़ुशी ज्यादा देर तक नही ओढे रहा सकता।

             आख़िर जब कोइ कहता है कि मिथायी खाओ तो कहना ही पडता है भाई मुझे शुगर की बीमारी है। कोई कहता चलो थोडा पैदल घूम कर आये तो कहना ही पड़ता है कि मेरे घुटनों में दर्द होता है । कोइ कहता है चलो यार ऊपर छत पर चलें तो कहना ही पडता है यार मुझे उच्च्राव्क्त्चाप की बीमारी है। मतलब यह कि बहुत जल्दी हमारे दुखों की असलियत सबके सामने खुल जाती है, हमारे मन में उस समय जो पीडा होती है वहा हमें जीते जीं नरक का अहसास कराती है और हमें लगता है कि सब कुश होते हुए भी हमारे पास कुश भी नहीं है। यह हालत हमारे ही बनाए हुए हैं। अब भी समय है कि चेत जाये वर्ना एक दिन एसा आयेगा जब हम सब कुश लुटा बेठेंगे

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