चारों और वृक्षों से घिरा
खिर्की पर है सुन्दर कांच लगा
चिकने पत्थर का फर्श
रोशनी से चमकते हुए कमरे
सभी के मन में आलीशान मकान
एक सपना होता है
सपने भी सुख की कल्पना
प्रतिष्ठत होने के चाहत
और नगर सेठ बनने की इच्छा
सभी पाल लेते हैं
पर क्या सब सपने साकार होते हुए भी
कभी सुख हमारा साथी होता है
ढ़ेर सरे प्रपंच रचकर
दिनभर कभी दुसरे को
कभी स्वयम को ठग कर
नाम इश्वर का नाम लेकर
अपने लिए जब हम
महल बनाते हैं
फिर भी पाने की तसल्ली के बाद
खालीपर का अहसास होता हैं
फिर ढूंढते हैं मन की शांति
भगवान के घर द्वार
मत्था टेक और हाथ बांधकर
अपने दिल को इन्सान होने का बोध
जबरन करते हैं
फिर मन में कहीँ न कहीँ
हताशा का महौल होता है
सुबह उठकर की पक्षियों को
दनापनी डाला होता
आवारा पशुओं को देता खाना
निर्धन बच्चों सज दीं होती किताब
और ज्ञान का यज्ञ किया होता
तो जान पाते जीवन सज सुख
जो धन संचय में नहीं
त्याग से नसीब में होता है
दिया दान जिसे न देखे चेहरा
वही सच्चा दानी है